इस्लामिक स्टेट के काबुल बम धमाके: एक नई जियो पॉलिटिकस की होगी शुरुआत?

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

अफगान तालिबान के कई कमांडरों ने अफगान तालिबान को छोड़कर इस्लामिक स्टेट (खुरासान) की सदस्यता ले ली।

काबुल एयरपोर्ट पर बम धमाके ने साफ संकेत दिया है कि अफगानिस्तान अब फिर से लंबे गृह युद की तरफ अग्रसर होने वाला है। एयरपोर्ट पर धमाके में 80 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। इस्लामिक स्टेट ने धमाके की जिम्मेवारी ले ली है।

स्टेट
काबुल एयरपोर्ट के धमाके

काबुल एयरपोर्ट के धमाके के साफ संकेत है कि तालिबान के खिलाफ इस्लामिक स्टेट की मोर्चेबंदी अब अफगानिस्तान में होगी। मतलब साफ है। नई जियोपॉलिटिक्स अब इस इलाके के जियो-इकनॉमिक्स को शेप देगी।

बेशक ताजिक, उजबेक और हजारा मिलिशिया गुट तालिबान के मुकाबले इस समय कमजोर है। लेकिन किसी ने जरूर तालिबान के खिलाफ इस्लामिक स्टेट को अफगानिस्तान में खड़ा कर दिया है।

इसका प्रभाव सेंट्रल एशिया, ईऱान, पाकिस्तान औऱ इस इलाके में अपना आर्थिक वर्चस्व खड़ा करने की कोशिश में लगा चीन पर पड़ेगा। इस्लामिक स्टेट को अफगानिस्तान में मजबूत करने के पीछे किसकी दिलचस्पी है यह समय के साथ पता चल जाएगा। दरअसल इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि इस्लामिक स्टेट का खलीफा रहा अबु बकर अल बगदादी अमेरिकी कब्जे में भी रहा है।

सीरिया

सीरिया में पिछले कई सालों से चल रहे जंग को समझने के बाद अफगानिस्तान में आगे क्या होगा इसे समझना आसान होगा। सीरिया में इस्लामिक स्टेट को बशर अल असद की सरकार के खिलाफ खड़ा किया गया। बशर अल असद की सरकार पलटने की इच्छा कौन-कौन से मुल्क रखते रहे है, इसे सारी दुनिया जानती है।

इराक के तेल औऱ गैस को सीधे भूमध्यसागर के रास्ते ले जाने की इच्छा पश्चिमी तेल कंपनियों की तभी पूरी हो सकती है, जब सीरिया पर कंट्रोल हो। वहां पश्चिमी देशों की तेल औऱ गैस कंपनियों की मर्जी की सरकार हो।

बशर अल असद

असद इराक में काम कर रही तेल कंपनियों की पसंद कभी नहीं रहे। वैसे में सीरिया में अल्पसंख्यक अल्वाइट मुस्लिम बशर अल असद के राज के खिलाफ इस्लामिक स्टेट को खड़ा किया गया। यह भी एक सच्चाई है कि इस्लामिक स्टेट का अबु बकर अल बगदादी लंबे समय तक अमेरिकी डिटेंशन सेंटर में रहा।

लेकिन असद सरकार को गिराने में कामयाबी असद विरोधियों को नहीं मिल पायी। असद परिवार शिया अल्पसंख्यक (अल्वाइट) समुदाय से संबंधित है, जिसके ईऱान से अच्छे संबंध है। इसका लाभ उठाते हुए इस्लामिक स्टेट का सीरिया मे जमकर इस्तेमाल किया गया। असद सरकार को उखाड़ने की पूरी कोशिश की। लेकिन असद रूस और ईऱान के सहयोग से बच गए। शिया आतंकी संगठन हेजबुल्लाह ने भी असद की खासी मदद की।

दरअसल इस्लामिक स्टेट के कमांडरों और कुछ अमेरिकी लीडरों के संबंध जगजाहिर है। सीरिया औऱ इराक में हुई हिंसा में इस्लामिक स्टेट के दवारा प्रयोग किए गए हथियार चर्चा का विषय रहे हैं। ईरान ने तथ्यों के साथ आरोप लगाया कि इस्लामिक स्टेट को हथियार उपलब्ध करवाने वालों में इजरायली और अमेरिकी शामिल रहे हैं। दरअसल शिया ईऱान और इजरायल की दुश्मनी जग-जाहिर है।

इस्लामिक स्टेट
इस्लामिक स्टेट

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस्लामिक स्टेट के धमाके का सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा? अगर अफगानिस्तान में गृह युद छिड़ा तो अफगान जनता तबाह हो जाएगी। लेकिन इस जंग से तबाह वो भी होंगे जो इस समय अफगानिस्तान में आपदा में अवसर देख रहे है। बात चीन और पाकिस्तान की हो रही है। जो कुछ फिलहाल साफ नहीं दिख रहा है, उसे देखने की जरूरत है।

अगर इस्लामिक स्टेट और तालिबान के बीच जंग तेज हो गई तो अप्रत्यक्ष नुकसान किसे होगा? चीन को। चीन लगातार तालिबान के प्रति सॉफ्ट हो रहा है। दरअसल चीन की नजर अफगानिस्तान के खनिज संसाधनों पर है। चीन इन संसाधनों का दोहन अपनी शर्तों पर करना चाहता है। दूसरे शब्दों में कहे तो अफगानिस्तान के संसाधनों को लूटना चाहता है।

लेकिन इससे आगे इस इलाके के जियो-इकनॉमिक्स एक और है, चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव। चीन का मित्र पाकिस्तान इस समय काबुल में स्ट्रैटजिक डेफ्ट हासिल कर चुका है। चीन अफगानिस्तान में पाकिस्तान का इस्तेमाल करना चाहता है। अफगान तालिबान से पाकिस्तान के अच्छे संबंधों का इस्तेमाल चीन अपने पक्ष में कर रहा है।

चीन अफगानिस्तान में पाकिस्तान का इस्तेमाल करना चाहता है।

दरअसल चीन बलूचिस्तान के क्वेटा से लेकर तुर्केमेनिस्तान के अश्काबाद तक जाने वाले आर्थिक गलियारे को सीधे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल करना चाहता है। चीन इसी रूट पर बनने वाले तापी गैस पाइप लाइन को अपने कंट्रोल में लेना चाहता है।

किसी जमाने में इस कॉरिडोर को अमेरिकी कंपनी उनाकोल अपने कंट्रोल में लेना चाहती थी। 1998 तक अमेरिकी प्रशासन उनाकोल के लिए तालिबान के साथ लॉबिंग करता रहा। 1997 में तालिबान के कमांडर दो बार अमेरिका के दौरे पर गए, जमकर अमेरिकी आतिथ्य का आनंद भी लिया।

इस्लामिक स्टेट के काबुल एयरपोर्ट पर हमले के बाद अफगानिस्तान में हिंसा का नया दौर शुरू हो सकता है। इस्लामिक स्टेट का खुरासान ब्रांच मूल रूप से तालिबान से बगावत कर बैठे छोटे कमांडरों का ही एक जमावड़ा है। इनके संबंध तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्नतान से बहुत ही अच्छे है।

इस्लामिक स्टेट (खुरासान)
इस्लामिक स्टेट (खुरासान)

अफगान तालिबान के कई कमांडरों ने अफगान तालिबान को छोड़कर इस्लामिक स्टेट (खुरासान) की सदस्यता ले ली। उन्होंने धीरे-धीरे अफगानिस्तान में अपना वसूली क्षेत्र विकसित किया। इधर इस्लामिक स्टेट की गतिविधि पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनखवा में भी पिछले कुछ सालों में बढी। कराची में तो कुछ पाकिस्तानी एलिट परिवार भी इससे जुड़े पाए गए।

इस्लामिक स्टेट अफगान तालिबान के तर्ज पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के कंट्रोल में नहीं है। लेकिन पश्चिमी खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ इसमें जरूर है। काबुल एयरपोर्ट पर धमाके के बाद पाकिस्तान और चीन की घबराहट बढनी तय है जो अमेरिकी सेना की वापसी पर जश्न मना रहे है।

इस्लामिक स्टेट ने पिछले कुछ सालों में अफगानिस्तान के अंदर भीषण हमले किए है। इस संगठन ने ही अल्पसंख्यक सिखों को अफगानिस्तान में टारगेट किया। इस संगठन ने पाकिस्तानी स्टैबलिशमेंट को भी टारगेट किया और पाकिस्तान में भी कई हमले किए है। 2018 में पेशावर में इस्लामिक स्टेट के धमाके में 140 लोगों की मौत हो गई थी। जनवरी मे बलूचिस्तान में हमले में भी कई हजारा जाति के मारे गए थे।

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संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर पकड़ रखने वाले लेखक हैं।

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