भारत के पास अफगान तालिबान से बातचीत के अलावा दूसरा चारा ही क्या है?

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

पिछले तीन दशक से भारत की अफगान नीति लचर और अदूरदर्शी रही है।

कतर की राजधानी दोहा में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल और अफगान तालिबान के सीनियर कमांडर शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई के बीच पहली औपचारिक बैठक हुई है। उधर सुरक्षा परिषद में भी अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन प्रायोजित अफगानिस्तान संबंधी प्रस्ताव पारित हो गया है।

भारत
शेर मोहम्मद अब्बास और दीपक मित्तल

लेकिन सबसे दिलचस्प मामला भारतीय राजदूत की दोहा में अफगान तालिबान के प्रतिनिधि से मुलाकात है।

इस मुलाकात के बाद अफगानिस्तान को लेकर भारत और तालिबान के बीच बातचीत का औपचारिक चैनल खुल गया है। इससे पहले स्तानकजई ने अपने वीडियो मैसेज में कहा था कि इंडियन सबकंटिनेंट में भारत का महत्वपूर्ण देश है और भारत के साथ तालिबान आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध को बनाए रखना चाहता है।

पिछले तीन दशक से भारत की अफगान नीति लचर और अदूरदर्शी रही है। तालिबान की वापसी की उम्मीद भारतीय डिप्लोमेसी को नहीं थी। यह भारतीय डिप्लोमेसी की बड़ी विफलता है। इंडियन डिप्लोमेसी अमेरिकी खेल को समझ नहीं पायी। ये भी हो सकता है कि समझने के बाद भी भारतीय डिप्लोमेसी अमेरिकी खेल को नजर अंदाज करती रही।

तालिबान की जमीनी पकड़ की जानकारी भारत को थी या नहीं यह एक बहस का विषय है। लेकिन निश्चित तौर पर अमेरिकी कुटनीति को भारत समझ नहीं पाया। वैसे काबुल में पाकिस्तान की स्ट्रैटजिक डेफ्थ की चिंता भारत को हमेशा रही है।

पाकिस्तान विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी तालिबान के मैंबर्स के साथ (फाइल फ़ोटो)

आज पाकिस्तान काबुल में स्ट्रैटजिक डेफ्थ हासिल कर चुका है। लेकिन भारतीय अफगान नीति बीते बीस सालों में अफगानिस्तान में कुछ भी हासिल नहीं कर पायी। भारत को गंवाने के लिए सिवाए कुछ नहीं मिला है। अगर भारतीय निवेश को बचाना है तो तालिबान से बातचीत का अलावा भारत के पास कोई रास्ता नहीं है।

भारत ने अफगानिस्तान में वही किया, जो अमेरिका ने कहा। अफगानिस्तान के विकास के लिए भारत ने 3 अरब डालर अफगानिस्ता में लगा दिए। जबकि दूसरी तरफ अफगानिस्तान के बहाने पाकिस्तान अमेरिका से अरबों डालर हासिल करने में सफल रहा। पाकिस्तान ने अपने हित खूब साधे।

उधर रूस, चीन और ईऱान की अफगान नीति स्वतंत्र रही। यही नहीं रूस ने अपने उन राजनयिकों का बेहतर इस्तेमाल अफगानिस्तान में किया जो 1980 के दशक से अफगानिस्तान मामलों को देखते रहे हैं।

रूसी विशेष दूत ज़मीर काबुलोव के साथ तालिबान का प्रतिनिधिमंडल

रूस ने अफगानिस्तान मामलों का विशेष दूत जमीर काबुलोव को बनाया। जमीर काबुलोव अफगानिस्तान मामले को पिछले चार दशकों से देख रहे हैं।

काबुलोव 1980 के दशक से अफगानिस्तान से जुड़े थे। यही नहीं चीन भी ताजिकिस्तान सीमा पर अपनी खुद की मौजूदगी के साथ पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान को डील करता रहा है।

अमेरिका अपने हिसाब से अफगानिस्तान में खेल करता रहा है। अफगानिस्तान में बीस साल के जंग से अमेरिकी कारपोरेट सेक्टर के हित सधे हैं। चाहे वो अमेरिकी तेल कंपनियां हो या हथियार बेचने वाली कंपनियां।

अमेरिका ने कई पश्तूनों का इस्तेमाल अपने हितों को साधने के लिए किया। जॉलमय खलीलजाद और हामिद करजई इसके बड़े उदाहरण है। अशरफ घनी भी एक उदाहरण है। जॉलमय खलीलजाद किसी जमाने में अमेरिकी तेल कंपनी ऊनाकोल के साथ जुड़े थे।

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में तालिबान औऱ यूएस के बीच हुए समझौते के सूत्रधार जॉलमय खलीलजाद ही थे। खलीलजाद तो तालिबान -1 के कार्यकाल में तालिबान प्रतिनिधिमंडल का स्वागत अमेरिका में कर रहे थे। क्योंकि वे अमेरिकी तेल कंपनी ऊनाकोल के हितों की रक्षा के लिए तालिबान के साथ लॉबिंग कर रहे थे।

यही नहीं अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई जिन्हें अफगान तालिबान और पाकिस्तानी स्टैब्लिशमेंट सीआईए का एजेंट कहते रहे हैं, आज भी अमेरिकी हितों का खासा ख्याल अफगानिस्तान में रखे हुए हैं। वे तालिबान औऱ अमेरिका के बीच पिछले 20 सालों से ब्रिज बने हुए हैं।

दरअसल अमेरिका ने तो पांच साल पहले ही अफगानिस्तान से निकलने की तैयारी कर ली थी। फिर हमारा मुल्क किस मुगालते में था, यह समझ में नहीं आया।

हामिद करजई की तालिबान से मुलाकात

अमेरिका के खास हामिद करजई अफगानिस्तान के राष्ट्रपति रहे। पिछले कुछ सालों से उनकी भाषा बदली हुई थी, वे लगातार तालिबान से बातचीत की वकालत कर रहे थे। आज करजई काबुल में ही है। तालिबान के कमांडरों से उनकी बैठकें हो रही हैं। क्या अमेरिका के इशारे के बिना यह संभव है? हामिद करजई ने पिछले साल सितंबर में ही भारत को भी तालिबान से बातचीत की सलाह दी थी।

सच्चाई तो यही है कि अफगानिस्तान मामले में अमेरिका ने पाकिस्तान को इग्नोर नहीं किया। पाकिस्तान को अफगान तालिबान के साथ हुई शांति प्रक्रिया में लगातार अमेरिका ने शामिल रखा।

यही नहीं तालिबान कमांडर भी पाकिस्तान से सलाह लेते रहे। उधर खलीलजाद समेत तमाम अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान से बातचीत करते रहे।

वे तालिबान को बातचीत के टेबल पर लाने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करते रहे। दिलचस्प बात है कि अफगानिस्तान में लगभग 3 अरब डालर का निवेश करने वाले भारत को अमेरिका ने बातचीत के टेबल पर कभी भी औपचारिक रूप से भी नहीं आमंत्रित किया।

भारत “क्वाड” का सदस्य है

भारत क्वाड का सक्रिय सदस्य बन अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए इंडो पैसेफिक में नया मोर्चा खोल रहा है । साउथ चाइना सी में भी भारत अमेरिका के कहने पर सक्रिय हो रहा है। लेकिन अमेरिका ने भारतीय हितों का जरा भी ख्याल अफगानिस्तान ने नहीं रखा। भारत “क्वाड” का सदस्य है, लेकिन अमेरिका ने शांति वार्ता के दौरान भारत को कभी भी आमंत्रित नहीं किया।

भारत “शंघाई सहयोग संगठन” (एससीओ) औऱ “आरआईसी” का सदस्य है, लेकिन रूस ने भी तालिबान से होने वाली शांति वार्ता में भारत को औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया। दूसरी तरफ अमेरिका के कट्टर दुश्मन ईऱान से भी अफगान तालिबान के सदस्य जाकर मंत्रणा करते रहे, अमेरिका ने तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

अमेरिका पाकिस्तान और अफगान तालिबान के गूढ संबंधों को समझना काफी जरूरी है। अलकायदा के बाद हक्कानी नेटवर्क को अमेरिका अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। लेकिन इस सच्चाई से अमेरिका नहीं इंकार कर सकता है कि जलालुद्दीन हक्कानी और सीआईए की गहरी दोस्ती 1980 के दशक में रही है।

अफगानिस्तान में सोवियत सेना के साथ हो रही लड़ाई मे हक्कानी, आईएसआई और सीआईए के बीच जोरदार गठजोड़ था। जलालुद्दीन हक्कानी जिसे अमेरिका दुनिया का सबसे ज्यादा खतरनाक आतंकी मानता रहा, उसे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने फ्रीडम फाइटर बताया था।

अनस हक्कानी

भारत जमीनी हकीकत समझने के बजाए हवाई कुटनीति अफगानिस्तान में बनाता रहा। अमेरिकी खेल को समझ नहीं सका। अमेरिका हक्कानी नेटवर्क को खतरनाक आतंकी संगठन बताता रहा। लेकिन दिलचस्प वाक्या यह है कि दोहा में चल रही शांति वार्ता में अफगान तालिबान की तरफ से हे शामिल वार्ताकारों में हक्कानी नेटवर्क का अनस हक्कानी भी शामिल रहा जो जलालुद्दीन हक्कानी का छोटा बेटा है।

अनस हक्कानी जलालुद्दीन हक्कानी का छोटा बेटा है। अनस हक्कानी कई सालों तक अमेरिकी कैद में रहा। अनस हक्कानी को दो साल पहले ही अमेरिकी कैद से छोड़ा गया। अनस का बड़ा भाई सिराजुद्दीन हक्कानी इस समय अफगान तालिबान का डिप्टी चीफ है। हक्कानी नेटवर्क का हेड है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम भी रखा गया है।

इसके बावजूद सिराजुद्दीन हक्कानी का एक लेख न्यूयार्क टाइम्स में अफगान तालिबान की नीतियों, अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर छपा। सिराजुद्दीन हक्कानी का लेख फरवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में हुए शांति समझौते से ठीक पहले छपा था। भारतीय कुटनीति को यह बात समझ में क्यों नहीं आयी कि अमेरिकी एजेंटो की भारी मौजूदगी के बावजूद हक्कानी नेटवर्क का खलील हक्कानी इस्लामाबाद और रावलपिंडी में घूमता रहा। खलील हक्कानी जलालुद्दीन हक्कानी का नजदीकी रिश्तेदार है।

अफगानिस्तान में अब खलील हक्कानी महत्वपूर्ण भूमिका में होगा। खलील हक्कानी लंबे समय से रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सैन्य हेडक्वार्टर में पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के साथ बैठक करता रहा है। खलील की बैठक पाकिस्तानी सेना के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ भी होती रही है।

इमरान खान के साथ जनरल बाजवा

दिलचस्प बात यह है कि जब जनरल बाजवा से सीआईए के अधिकारी हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई को कहते तो जनरल बाजवा अमेरिकी अधिकारियों से उल्टा सवाल पूछते थे कि “किधऱ है, बताइए। आप हमारे कार्यालय आइए हम साथ में हेलिकाप्टर से चलते है और उन्हें पक़ड़ कर लाते हैं”।

भारत को अमेरिकी कुटनीति का खतरनाक खेल समझना होगा। अमेरिका तालिबान से चाहता है कि तालिबान इस्लामिक स्टेट और अलकायदा के आतंकियों को अफगानिस्तान में पनाह न दे। अफगान धरती का इस्तेमाल आतंकवाद प्रायोजित करने के लिए न हो। हालांकि अमेरिकी प्राथमिकता में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयब्बा शामिल नहीं है।

उधर तालिबान अमेरिका से इसके एवज में अपने शासन की स्वीकार्यता चाहता है। ठीक वैसे ही जैसे सऊदी अरब के अलोकतांत्रिक राजशाही को अमेरिका स्वीकार करता रहा है। तालिबान अफगानिस्तान के लिए आर्थिक मदद भी अमेरिका से चाहेगा।

अगर अमेरिकी हितों की रक्षा तालिबान करेगा तो अमेरिका निश्चित तौर पर सऊदी अरब के तर्ज पर अफगान तालिबान के शासन को भी स्वीकार कर लेगा। हो सकता है कि कुछ समय बाद अमेरिका तालिबान की तारीफ भी करे। आखिर सऊदी अरब में भी तो राजशाही है। वहां लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है।

सऊदी अरब की राजशाही का रवैया भी महिलाओं के प्रति वही है, जो तालिबान का है। लेकिन सऊदी अरब अमेरिका का सबसे विश्वासपात्र दोस्त मिडिल ईस्ट में है। अगर सऊदी अरब अमेरिका का दोस्त हो सकता है, तो तालिबान क्यों नहीं?

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संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर पकड़ रखने वाले लेखक हैं।

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