तालिबान का ‘एलान-ए-माफ़ी’: क्या सचमुच बदल गए हैं हज़ूर?

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

तालिबान को इस समय की जियोपॉलिटिक्स की समझ है, इसलिए पहले से अलग थोड़ा सॉफ्ट नजर आ रहे है।

आखिरकार अफगानिस्तान को फिर उसकी किस्मत पर छोड़ दिया गया है। जियो-पॉलिटिक्स और जियो-इक्नामिक्स का केंद्रबिंदू अफगानिस्तान लंबे समय से वैश्विक ताकतों की जोर अजमाइश का अखाड़ा रहा। लेकिन इस अखाड़े में सबसे बड़ा नुकसान आम अफगान जनता को हो गया है। लगातार चालीस साल से हिंसा के शिकार लाखों अफगानी नागरिक दूसरे देशों में रिफ्यूजी बनकर जी रहे है।

कट्टर औऱ उदारवादी धड़े में बंटे अफगानियों की किस्मत हमेशा खराब रही है। वैश्विक शक्तियों ने उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल किया फिर उन्हें फेंक दिया। किसी जमाने में रूसियों ने उनका इस्तेमाल किया। फिर अमेरिका ने उन्हें इस्तेमाल किया। लेकिन अफगान जनता के हिस्से सिर्फ हिंसा, गरीबी, भूखमरी ही आयी।

तालिबान ने उम्मीद से ज्यादा तेजी से काबुल पर कब्जा किया। शांतिपूर्वक पावर ट्रांसफर भी हो गया। राष्ट्रपति अशऱफ घनी देश छोड़कर चले गए। जातीए और नस्लों में बंटी अफगान जनता को अब हिंसा के नए दौर की शुरूआत का डर सता रहा है। यह अफगानियों की किस्मत है कि पहले रूस ने धोखा दिया। रूस ने अफगानियों को उनके हाल पर छोड़ा।

नजीबुल्लाह

रूस समर्थक नजीबुल्लाह की हत्या हो गई। क्योंकि रूस के खास नजीबुल्लाह को रूस ने उनके हाल पर काबुल में छोड़ दिया था। अमेरिका और रूसी के व्यवहार में सिर्फ अंतर यही है कि अमेरिका ने अशरफ घनी को सुरक्षित निकाल लिया। शायद सारी स्क्रीप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी।

दिलचस्प बात यह है कि पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजाई फिलहाल अफगानिस्तान में डटे हुए है। हालांकि वे भी अमेरिका के पार्टनर है। लेकिन काबुल छोड़कर नहीं भागे। मतलब साफ है। अमेरिका औऱ तालिबान के बीच अंदर खाते लंबे समय से बातचीत चल रही थी। फंसे तो अफगान उदारवादी।

आखिर करजई किसके भरोसे दिलेरी से काबुल में डटे है? हामिद करजाई पाकिस्तान विरोधी है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान के वर्चस्व का शुरू से ही विरोध करते रहे है। यही नहीं उन्होंने लगातार भारत को तालिबान से बातचीत करने को प्रेरित किया। उन्होंने खुले तौर पर बताया कि तालिबान दक्षिण एशिया में भारत के महत्व को समझता है।

सत्ता के बदलाव के बाद तालिबान के नए प्रशासनिक ढांचे को पुरानी तालिबानी व्यवस्था लागू किया जाएगा, इस पर फिलहाल बहस हो रही है। निश्चित तौर पर समय के साथ तालिबान में बदलाव आया है। उसका एक बड़ा कारण तालिबान में एक नए जनरेशन का बढ़ता प्रभाव है जो एंड्रायड मोबाइल पर व्हाट्सएप का इस्तेमाल करता है। बदलीत दुनिया के साथ चलना चाहता है।

नए जनरेशन को यह पता है कि पुराने तालिबानी शासन की बहाली के बाद शायद ही वैश्विक शक्तियों से सहयोग मिलेगा। इसलिए फिलहाल तालिबान सॉफ्ट दिख रहा है। इस्लामी नियमों के तहत मानवाधिकार बहाल की बात कर रहा है। वहीं तालिबान को इतना जरूर पता है कि अगर फिर से अफगानिस्तान वैश्विक शक्तियों के जंग का अखाड़ा बना तो इसका बड़ा नुकसान तालिबान को ही होगा।

इसमें कोई शक नही है कि तालिबान में जातीए और कबीलाई आधार पर आंतरिक विभाजन है। इस विभाजन का लाभ पश्चिमी शक्तियां लेती रही है। वैसे तो तालिबान पश्तून वर्चस्व वाला संगठन है। लेकिन पश्तून भी कई कन्फडरेशनों में विभाजित है। वहीं पश्तून विरोधी जनजातियां जिसमें ताजिक, उजबेक और हजारा शामिल है, उन्हें लेकर चलना तालिबान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अफगानिस्तान में सामने आने वाली है।

हामिद करजाई

अब हामिद करजाई काबुल में मौजूद है जो राष्ट्रपति रहते हुए तालिबान के प्रखर विरोधी थे। लेकिन उनका कॉंफिडेंस का स्तर देखते बनता है। करजाई के कॉंफिडेंस का कारण तालिबान की कबीलाई मानसिकता है। तालिबान का नंबर 2 मुल्ला अब्दुल गनी बरादार है करजई के नजदीक है, जो अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति बन सकता है।

मुल्ला बरादार दुर्रानी कन्फड्रेशन के पोपलजाई कबीले से संबधित है। करजई भी इसी पोपलजई कबीले से संबंधित है। दोनों के लम्बे समय से बहुत ही अच्छे सम्बन्ध है। इस अच्छे सम्बन्ध का आधार कबीलाई बॉन्डिंग है। अफगानिस्तान में तालिबान पर अमेरिकी हमले के बाद लगातार मुल्ला बरादार को करजाई की मदद मिलती रही है।

मुल्ला बरादार और करजाई के अच्छे सम्बन्ध से पाकिस्तानी आईएसआई काफ़ी परेशान रहा है। दरअसल करजाई और मुल्ला बारदर के मधुर संबंधों से नाराज पाकिस्तान ने 2010 में बरादार को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। 8 साल जेल में रहने के बाद अमेरिकी प्रेशर में बरादार को पकिस्तान ने जेल से रिहा किया था।

मुल्ला बरादर

एक तरफ तालिबान में मुल्ला बरादर का महत्व और हामिद करजई से उसके संबंध पर लगातार सवाल उठते रहे है। अभी तक बरादर ही दोहा वार्ता को लीड करता रहा है। वही रूस, चीन औऱ पाकिस्तान के नेताओं से बातचीत करता रहा है। मुल्ला बरादर का तालिबान मे महत्व इसलिए भी रहेगा कि वो तालिबान का संस्थापक सदस्य है और तालिबान का पहला मुखिया मुल्ला उमर का रिश्तेदार भी है।

दरअसल तालिबान को समझने से पहले पश्तूनों की संस्कृति और उनकी कबीलाई मानसिकता को समझना जरूरी होगी। इमरान खान को तालिबान खान कहा जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इमरान खान भी नियाजी पश्तून है। हालांकि पश्तूनों को अंदर विभिन्न कबीलों में आंतरिक संघर्ष भी होता रहा है। लेकिन अफगानिस्तान में पश्तूनों का ताजिक, उजबेक जातियों से बहुत पुराना संघर्ष होता रहा है।

पश्तूनों का सबसे बड़ा केंद्र कंधार रहा है। कंधार पर किसी जमाने में गिल्जई पश्तूनों का शासन था। गिल्जई कन्फडरेशन के होटक शासकों और दुर्रानी पश्तूनों के बीच कंधार पर कब्जे के लिए संघर्ष हुआ। 18 वीं दी में अहमद शाह अब्दाली ने कंधार को अपने शासन का केंद्र बनाया था। अब्दाली दुर्रानी पश्तून था। कंधार को केंद्र बनाकर कई दूसरे इलाकों पर इन शासकों ने हमला किया।

नादिर शाह

कंधार अब्दाली के पास गिल्जई कन्फडरेशन के होटकों से कब्जे में लिया था। कंधार पर कब्जे के लिए गिल्जई और दुर्रानियों का भी आपसी संघर्ष हुआ है। दरअसल कंधार पर 1709 से लेकर 1738 तक गिल्जई होटकों ने राज किया।

ईरान के नादिर शाह ने कंधार पर हमला कर होटकों का राज खत्म किया था। लेकिन होटकों के राज को खत्म करने में नादिर शाह को प्रमुख सहयोग कंधार और इसके आसपास के दुर्रानी पश्तूनों से मिला था। इन्हें में एक अहमदशाह अब्दाली भी शामिल था।

हालांकि आज पश्तूनों के दुर्रानी और गिल्जई कन्फडरेशन तालिबान में एक साथ है। उनके बीच अच्छा तालमेल है। लेकिन उनके बीच तीखा विवाद हो जाए, इसे कहना मुश्किल है।

हैबतुल्लाह अखूंजाद

वर्तमान में तालिबान का मुखिया हैबतुल्लाह अखूंजाद दुर्रानी कन्फडरेशन के नूरजई कबीले से संबंधित है। जबकि मुल्ला बरादर जो नंबर 2 पर है वो भी दुर्रानी कन्फडरेशन के पोपलजई कबीले से संबंधित है। हैबतुल्लाह अखूंजाद से पहले तालिबान का मुखिया मुल्ला अख्तर मंसूर था जो अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था, वह भी दुर्रानी कन्फडरेशन के इश्कजई कबीले से संबंधित था।

मुल्ला अख्तर मंसूर ईरान से लौटते हुए पाकिस्तानी सीमा के अंदर अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था। हालांकि तालिबान का पहला मुखिया मुल्ला उमर होटक था।

मुल्ला उमर का बेटा याकूब इस समय तालिबान में मजबूत स्थिति में है, लेकिन कम उम्र तालिबान के अंदर दुर्रानियों की मजबूत स्थिति के कारण वो तालिबान का मुखिया नही बन पाया। लेकिन इस समय वो मजबूत स्थिति में है और तालिबान के मिलिट्री ब्रांच का हेड है।

मुल्ला याकूब

मुल्ला अख्तर मंसूर के मौत के बाद याकूब को भी तालिबान का मुखिया बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन तालिबान में सक्रिय दूसरे गुटों ने याकूब की योजना को विफल कर दिया। याकूब मुल्ला बरादर की तरह पश्चिमी ताकतों के साथ बातचीत का पक्षधर है।

तालिबान मे मजबूत तो दुर्रानी और गिल्जई कन्फडरेशन से संबंधित कबीले ही है। लेकिन पश्तूनों के दूसरे कन्फडरेशन भी तालिबान में मजबूत स्थिति प्राप्त कर चुके है। इसका उदाहरण हक्कानी नेटवर्क है। करलानी कन्फडरेशन का जदरान कबीला से संबंधित सिराजुद्दीन हक्कानी तालिबान का डिप्टी चीफ है। उसकी स्थिति भी तालिबान में मजबूत है।

यह भी सच्चाई है कि ये कबीले अपने इलाके में दूसरे कबीलों के हस्तक्षेप को बरदाश्त कतई नहीं करते। संसाधनों पर कब्जे को लेकर इनके बीच संघर्ष होता रहा है। पूर्वी अफगानिस्तान और इसके साथ लगते पाकिस्तान के 7 ट्राइबल एजेंसियों मे करलानी कन्फडरेशन से संबंधित पशतून कबीलों का आपसी संघर्ष लगातार होता रहा है। पाकिस्तान को पश्तूनों का यह कल्चर पता है। पाकिस्तान के वजीरस्तान इलाके में करलानी कन्फडरेशन के वजीर और महसूद कबीले के बीच संसाधनों पर कब्जे के लिए लंबे समय से संघर्ष हो रहा है।

पर इस समय तालिबान में एक और मजबूत पश्तून कबीले की भागीदारी है। इस कबीले के प्रमुख प्रतिनिधि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के नजदीक है। दरअसल तालिबान के अंदर तीसरा महत्वपूर्ण धड़ा जदरान कबीले का है, जो पश्तूनो के करलानी कन्फडरेशन से संबंधित है। खतरनाक हक्कानी नेटवर्क जदरान कबीले से संबंधित है। इसका संस्थापक जलालुद्दीन हक्कानी है।

जलालुद्दीन हक्कानी

जलालुद्दीन हक्कानी का करलानी कन्फडरेशन पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर काफी मजबूत है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर पाकिस्तान की सात ट्राइबल एजेंसियों मेंं पश्तूनों का करलानी कन्फडरेशन काफी मजबूत है। उतरी वजीरस्तान और दक्षिणी वजरीस्तान में करलानी कन्फडरेशन से संबंधित तमाम कबीले काफी मजबूत स्थिति में है, जिसमें वजीर और महसूद कबीला शामिल है।

हालांकि लगातार यही कहा जा रहा है कि तालिबान का काबुल पर काबिज होने के बाद पाकिस्तान की स्थिति अफगानिस्तान मे मजबूत होगी। हालांकि यह कहना काफी जल्दीबाजी होगी। क्योकिं इस समय तालिबान के अंदर ईरान की भी घुसपैठ है। वहीं अफगान तालिबान का एक धड़ा लंबे समय से पाकिस्तान से स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहा है। हालांकि बडी संख्या में तालिबान कमांडरों की शिक्षा और प्रशिक्षण पाकिस्तान को अकोरा खटक के जामिया हक्कानियां में संपन्न हुआ है।

लेकिन समय के साथ जियो पॉलिटिक्स की समझ तालिबान के लीडरों को हो गई। मुल्ला बरादर ने जब स्वतंत्र होकर तालिबान को काम करने के लिए प्रेरित किया तो उसे पाकिस्तान ने जेल में डाल दिया था। क्योंकि बरादर लगातार पाकिस्तान को कॉन्फिडेंस में लिए बिना हामिद करजई से बातचीत कर रहा था। मुल्ला बरादर समेत कई तालिबान कमांडर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा रेखा डूरंड लाइन को नहीं मानते है। वे ग्रेटर पश्तून क्षेत्र के समर्थक है, जिससे पाकिस्तान हमेशा घबराता रहा है। वैसे में पाकिस्तान के कितना नियंत्रण में तालिबानी कमांडर रहेंगे यह समय बताएगा।

तालिबान को इस समय की जियोपॉलिटिक्स की समझ है, इसलिए पहले से अलग थोड़ा सॉफ्ट नजर आ रहे है। उन्हें यह पता है कि सुन्नी इस्लाम का लीडर सऊदी अरब इस समय फिलिस्तीन को अकेला छोड़ इजरायल से बातचीत कर रहा है। संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के बीच समझौता हो चुका है।

उसे यह भी पता है कि सऊदी तेल कंपनी अरामको जिससे तालिबान को किसी जमाने में फंडिग मिलती रही है, इस समय भारत के एक बड़ी पेट्रोलियम कंपनी में अपनी हिस्सेदारी डाल रही है। इन बदलती परिस्थितियों में पाकिस्तान कंधारी पश्तूनों के बराबर हक्कानी नेटवर्क को मजबूत रखेगा। हक्कानी नेटवर्क आईएसआई के काफी करीब है।

चीन इस समय तालिबान के प्रति काफी सॉफ्ट है। मुल्ला बरादर ने कुछ समय पहले ही चीन के विदेश मंत्री से चीन जाकर बातचीत की थी। तालिबान भी चीन का महत्व समझ रहा है। चीन की अपनी चिंताए है। चीन को डर है कि तालिबान का वर्चस्व उसके मध्य एशिया के आर्थिक एक्सपेंशन प्लॉन पर ग्रहण लगा सकता है। क्योंकि तालिबान के अंदर अमेरिकी घुसपैठ से चीन परिचित है। वैसे एकाएक अमेरिकी सैनिकों के एग्जिट को चीन संदेह के नजरिये से देख रहा है।

शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर मुस्लिम ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ चला रहे हैं जिसका मकसद चीन से अलग होना है.

दरअसल चीन की चिंता पश्चिमी चीन के शिंजियांग प्रांत के उइगुर है, जो चीन से स्वतंत्रता चाहते है। इनके संबंध तालिबान से बहुच अच्छे है। उइगुर आतंकियों को शरण तालिबान के कमांडर देते रहे है। यही नहीं उनकी ट्रेनिंग भी अफगानिस्तान के अंदर होती रही है।

चीन को डर है कि अफगान-चीन सीमा पर उइगुर आतंकियों की गतिविधियां तालिबान के शासन के बाद बढेगी। इसमें अमेरिका अपने आर्थिक संसाधनों का भी इस्तेमाल कर सकता है।

चीन को आशंका है कि अमेरिका फिर से इस इलाके में अशांति फैलाना चाहता है, ताकि चीन के बेल्ट एंड रोड पहल के प्रोजेक्टों हुए निवेश को नुकसान हो। चीन अबतक चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर में 35 अरब डालर का निवेश कर चुका है। अगर अफगानिस्तान में तालिबान शासन में अशांति होगी तो चीन का पाकिस्तान मे हुए निवेश पर सीधा असर होगा। हाल ही में पाकिस्तान के खैबर पखतूंखवा के कोहिस्तान जिले में हुए बम धमाके में कई चीनी नागरिक मारे गए है। ये इस इलाके में बन रहे हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे, जो चीन के सहयोग से बनाया जा रहा है।

ਅਫ਼ਗਾਨਿਸਤਾਨदरअसल अफगान नेशनल आर्मी ने जिस तरह से तालिबान के सामने सरेंडर किया है उससे कई सवाल उठ खड़े हुए है। कई देश इसलिए अमेरिका के वापसी पर सवाल उठा रहे है।

अमेरिका ने अफगान नेशनल आर्मी और पुलिस पर 100 अरब डालर खर्च किया। लेकिन वो कुछ हफ्ते में तालिबान के सामने सरेंडर कर गए। और तो और उन्हें अमेरिकी एयरफोर्स की तरफ से लॉजिस्टिक सपोर्ट नहीं मिला।

एयरफोर्स से टेक्निकल कामों को देखने वाले सारे कांट्रेक्टर अमेरिका ने पहले ही अफगानिस्तान से बुला लिए थे। कहा तो यह भी जा रहा है कि अफगान सेना को तैयार करने पर खर्च गिए रकम का बड़ा हिस्सा सिर्फ अफगान सेना के कमांडरों ने ही नहीं खाए, बल्कि अमेरिकी कांट्रेक्टर भी बड़ी रकम खा गए। जबकि लगातार दावा किया गया कि एक मजबूत अफगान सेना का गठन किय गया है। इसके लिए अफगानिस्तान के कबीलाई विभाजन को संतुलित करने की कोशिश की गई।

कबीलाई सामांजस्य और संतुलन को बनाए रखने के लिए अफगान सेना में लगभग 38 प्रतिशत पश्तून, 25 प्रतिशत ताजिक, 19 प्रतिशत हजारा, 8 प्रतिशत उजबेको की भर्ती की गई। ये तमाम जनजातियां लडाकू रही है, आपस में लड़ती रही है, लेकिन इनके समन्वय से बने अफगान सेना ने तालिबान के सामने घुटने टेक दिए। क्या एक सोची समझी रणनीति के तहत ये सारा कुछ किया गया, करवाया गया?

आखिर बीस सालों में तालिबान को कमजोर करने में नाटो सेना विफल क्यों हो गई ? अमेरिकी प्रशासन के दोहरे चरित्र पर सवाल उठ रहा है। सीआईए के दोहरे चरित्र पर सवाल उठ रहा है। नाटो की मौजूदगी में अफगानिस्तान में अफीम की खेती का विस्तार होता गया। तालिबान ने अफीम की खेती से अपनी आय को बढाया। उधर पाकिस्तान का कवेटा शहर पिछले बीस सालों से तालिबान का घोषित राजधानी रहा।

इसके बावजूद अमेरिकी सेना की कार्रवाई से तालिबान के बड़े कमांडर बचे रहे। नाटो के मौजूदगी के बावजूद अफगानिस्तान में अफीम की खेती बढ़ती गई, उत्पादन बढ़ता गया, तालिबान अफीम की अंतराष्ट्रीय कीमतों को भी तय करता रहा। हालांकि 1990 के दशक के अंत में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनखवा में अफीम की खेती को समाप्त करने में पाकिस्तान सफल हो गया। लेकिन अफगानिस्तान के कई राज्यों में नाटो अफीम की खेती को खत्म करने में विफल रही।

अफगानिस्तान में अफीम की खेती

पिछले 20 सालों में अफगानिस्तान में अफीम की खेती में जबरजस्त इजाफा देखा गया। सलाना औसतन 2 से 5 लाख हेक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती यहां होती रही है। हजारों टन अफीम का उत्पादन सलाना यहां होता रहा। अफगानिस्तान के तमाम अफीम रूटों पर तालिबान का दबदबा नाटो की मौजूदगी में रही। यही नहीं तालिबान ने अंतराष्ट्रीय बाजार में अफीम की कीमतों को नियंत्रित करने का पूरा प्रयास किया, इसमें सफल भी रहा।

अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले के बाद अंतराष्ट्रीय बाजार में अफीम की कीमतें गिर कर 30 डालर प्रति किलो रह गई थी। तालिबान ने तुरंत अफगानिस्तान से अफीम की आपूर्ति रूकवा दी। यही नहीं एक साल के लिए हेलमंड जैसे राज्यों में अफीम की खेती भी तालिबान ने बंद करवा दी। इसका परिणाम यह हुआ कि अंतराष्ट्र्रीय बाजार में अफीम की कीमत 700 डालर प्रति किलो तक पहुंच गई।

अफीम के कारोबार में तालिबान, पश्चिमी ताकतें और अफगानिस्तान में शासन कर रहे हामिद करजई के खास लोगों के बीच आपसी सांठगांठ रहा। हेलमंड के प्रांत के तत्कालीन गर्वनर शेर मोहम्मद अखूंजाद अफीम के कारोबार में शामिल थे। ये तत्कालीन राष्ट्र्पति हामिद करजई के करीबी दोस्त थे। हामिद करजई के रिश्तेदारों पर भी अफीम का कारोबार करने का आरोप लगा।

क्या अमेरिका तालिबान को खत्म करने के लिए गंभीर कभी रहा ? कुछ सप्ताह में जिस तरह से पूरे अफगानिस्तान को तालिबान ने काबू किया, उससे यह स्पष्ट हो गया कि तालिबान की सैन्य ताकत बरकरार रही। वे अफगानिस्तान औऱ पाकिस्तान में अच्छे खासे हथियारों के साथ मौजूद रहे। दिलचस्प बात तो यह थी कि तालिबान के कमांडर क्वेटा, पेशावर में ही मौजूद रहे। उनके परिवार भी वहां मौजूद नजर आए।

तालिबान का क्वेटा शूरा की होने वाली बैठकों की जानकारी नाटो सेना को अक्सर रहती थी। लेकिन कोई भी तालिबान कमाडंर पर कार्रवाई नाटो सेना नहीं कर पायी। क्वेटा से 200 मील की दूरी पर स्थित पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ही स्थित शम्सी एयरबेस पर अमेरिकी सेना की मौजूदगी लंबे समय तक रही। लेकिन तालिबान के मुल्ला अख्तर मंसूर पर ही सिर्फ अमेरिकी ड्रोन चला।

वो भी इसलिए वो ईऱान का खासा नजदीक हो गया था। वो तेहरान स्थित रूसी दूतावास के भी नजदीक हो गया था। जबकि दूसरी तरफ तालिबान कराची के व्यापारियों, क्वेटा के सोनारों से फंड लेता रहा। अमेरिकी खुफिया एजेंसियां और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को तालिबान के फंडिग के सारे सोर्स पता रहे है।

तालिबान समर्थकों ने कराची के ट्रांसपोर्ट यूनियन पर भी अपना कब्जा कर लिया। तालिबान के सहयोग से वजीरस्तान इलाके के पश्तूनों ने कराची में अपना कारोबार जमकर बढाया। कराची के ट्रांसपोर्ट कारोबार में तालिबान ने निवेश किया। वहीं दुबई समेत पाकिस्तान के रिएल एस्टेट कारोबार में भी हक्कानी नेटवर्क ने निवेश किया।

कंधार-हेरात से होकर जाने वाले व्यापारिक गलियारे पर तालिबान का कब्जा साउथ एशिया के जियो इकनॉमिक्स में महत्वपूर्ण घटना है। अबतापी गैस पाइप लाइन रूट पर तालिबान का पूरा नियंत्रण है। ईऱान की सीमा के साथ लगते तमाम अफगान राज्यों पर तालिबान का कब्जा है। कंधार, हेलमंड, निमरोज, हेरात तालिबान के कब्जे में है। हेरात के मजबूत सरदार इस्माइल खान ने बिना लड़े तालिबान के सामने सरेंडर कर दिया।

इस्माइल खान

तालिबान के सामने इस्माइल खान का सरेंडर महत्वपूर्ण घटना है, क्योंकि इससे सीधे तापी गैस पाइप लाइन प्रोजेक्ट पर प्रभाव पडेगा। पाकिस्तान के बलूचिस्तान के क्वेटा से तुर्केमेनिस्तान तक जाने वाले आर्थिक गलियारे के भविष्य पर भी इस्माइल खान का सरेंडर प्रभाव डालेगा।। इस्माइल खान ने पहले शानदार जंग लड़ी है। इस्माइल खान ने सोवियत सेना के खिलाफ भी जंग लड़ी थी।

1995 की शुरूआत में तालिबान से भी इस्माइल खान ने जमकर टक्कर ली थी। हालांकि वे आईएसआई और तालिबान के मजबूत गठजोड़ के सामने हार गए थे और भागकर ईऱान में शरण ली थी। उनकी हार के बाद ही पाकिस्तान ने क्वेटा से तुर्केमेनिस्तान तक जाने वाले महत्वपूर्ण कॉरिडोर को अपने कंट्रोल में लेने की कोशिश की थी। क्योंकि इस पर तालिबान का कब्जा हो गया था। हालांकि पाकिस्तान के इस प्रयास को ईऱान ने विफल करने का हर इंतजाम किया।

दरअसल हेरात, कंधार पर तालिबान का कब्जे का जियो-इकनॉमिक इम्पैक्ट भी होगा। इससे सीधे-सीधे भारत, पाकिस्तान औऱ चीन प्रभावित हो रहे है। इस इलाके में भारत ने अपने डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को अंजाम दिया। अब पाकिस्तान इस इलाके को पीछे से नियंत्रित करने की कोशिश करेगा। अब देखना यह होगा कि ईरान पाकिस्तान के प्रयासों पर क्या रवैया अपनाता है ?

ईऱान कभी नहीं चाहेगा कि इस गलियारे पर पाकिस्तान का कंट्रोल हो। क्योंकि जिन राज्यों से यह गलियारा गुजर रहा है उससे ईरान की सीमा लगती है। इस आर्थिक गलियारे पर नजर चीन की है जो इसे बेल्ट एंड रोड पहल मे शामिल करना चाहता है।

ईरान के अपने आर्थिक हित इस इलाके में है। वहीं अगर तापी गैस पाइप लाइन प्रोजेक्ट लटकता है तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। चीन भी इसे अपनी महत्वकांक्षी योजना बेल्ट एवं रोड पहल में शामिल करना चाहता है।

दरअसल ईऱान की सीमा से लगते अफगानिस्तान के राज्यों में तालिबान की आसान जीत के बाद ईरान की पॉलिटिक्स पर चर्चा हो रही है। क्या ईऱान और तालिबान के बीच आपसी सहमति बनी हुई है ? इस्माइल खान ईऱान के भी नजदीक रहे है। उधर बीते कुछ सालों में तालिबान और ईरान के बीच संबंध में मधुरता आयी है।

सुन्नी तालिबान और शिया ईऱान के बीच 1990 के दशक में संबंध काफी खराब थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में ईरान और तालिबान नजदीक आए। इराक में मारे गए ईऱानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी ने तालिबान और ईऱान को नजदीक किया। ईऱान की सीमा में तालिबानी लड़ाकों को सुलेमानी के पहल पर ट्रेनिंग भी दी गई। पिछले कुछ सालों से ईरान तालिबान को हथियार भी उपलब्ध करवाता रहा है।

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संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर पकड़ रखने वाले लेखक हैं।

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